नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जहां एक ओर दुनियाभर में महिलाओं की समाज में पुरुषों से समानता व उनके सामाजिक अधिकारों के बारे में बातें की जा रही हैं, एक कड़वा सच भी महिलाओं के सामने आ खड़ा हुआ है – “दुनिया भर में छाई मंदी की मार महिलाओं पर अधिक भारी पड़ सकती है”
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का आंकलन है कि इस साल आर्थिक मंदी के कारण दो करोड़ 20 लाख महिलाएं बेरोजगार हो सकती हैं। संगठन की चेतावनी है कि इस साल आर्थिक मंदी के कारण रोजगार का संकट और गहरा हो सकता है। मंदी की मार से भारत की महिलाएं भी अछूती नहीं हैं। अखिल भारतीय महिला समिति की महासचिव सुधा सुंदररामन कहना है कि भारत में पहले से महिलाओं के सामने रोजगार के संकट बहुत अधिक हैं और आर्थिक मंदी के कारण महिलाओं के लिए रोजगार का संकट बहुत गहरा गया है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की ओर से वैश्विक रोजगार प्रवृतियों के बारे में जारी वार्षिक रिपोर्ट ‘ग्लोबल इम्प्लाइमेंट ट्रेंड्स फॉर वुमेन’ (गेट) में कहा गया है कि इस साल महिलाओं में बेरोजगारी की दर 7.4 तक पहुंच जाएगी जबकि पुरूषों में यह दर 7 प्रतिशत होगी। जाहिर है कि मंदी की मार महिलाओं पर पुरूषों की तुलना में कहीं अधिक होगी। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2008 में तीन करोड़ लोग रोजगार में थे जिनमें महिलाओं का प्रतिशत 40.4 था अर्थात 1.2 करोड़ महिलाएं रोजगार में थीं।
रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारी दर के संदर्भ में आर्थिक संकट का लैंगिक प्रभाव पुरूषों के मुकाबले महिलाओं के लिए अधिक हानिकारक होने की आशंका है। यह असर यूं तो विश्व के अधिकतर क्षेत्रों में देखा जाएगा, लेकिन लातिन अमेरिकी और कैरीबियाई क्षेत्र में यह अधिक स्पष्ट होगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में बेरोजगारी दर महिलाओं के लिए कम खतरनाक होगी वे हैं पूर्वी एशिया, विकसित अर्थव्यवस्थाएं और गैर-यूरोपीय संघ दक्षिण पूर्वी यूरोप और सीआईएस। यहां वर्तमान आर्थिक संकट से पहले भी महिलाओं और पुरूषों के बीच रोजगार अवसरों का अंतराल कम गहरा था।
वर्ष 2009 के श्रम बाजार के पूर्वानुमान, महिलाओं और पुरूषों के लिए वैश्विक श्रम बाजार में गिरावट प्रदर्शित करते हैं। आईएलओ का अनुमान है कि विश्व में बेरोजगारी दर 6.3 से 7.1 प्रतिशत के बीच पहुंच जाएगी ओर महिलाओं में यह दर 6.5 से 7.4 प्रतिशत होगी। पुरूषों में यह दर 6.1 से 7.0 प्रतिशत के बीच होगी, इसका परिणाम यह होगा कि विश्व स्तर पर बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ 40 लाख से लेकर 5 करोड़ 20 लाख के बीच पहुंच जाएगी। इनमें महिलाओं की संख्या एक करोड़ से लेकर दो करोड़ 20 लाख के बीच होगी।
आईएलओ का यह अनुमान भी है कि वैश्विक संवेदनशील रोजगार दर, वर्ष 2009 में महिलाओं के लिए 50.5 से 54.7 प्रतिशत के बीच होगी जबकि पुरूषों के लिए 47.2 से 51.8 प्रतिशत के बीच होगी। इसका अर्थ यह है कि आम तौर पर जहां महिलाओं पर संवेदनशीलता का अधिक दबाव होता है, इस आर्थिक संकट ने वर्ष 2007 के मुकाबले पुरूषों को भी रोजगार के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया है। “महिलाओं में निम्न रोजगार दर, सम्पत्ति और संसाधनों पर कमजोर पकड़, अनौपचारिक और संवेदलनशील रोजगार में मौजूदगी, निम्न आय और सामाजिक सुरक्षा की कमी, इन सभी के चलते वे पुरूषों के मुकाबले कमजोर स्थिति में पहुंच जाती हैं।” यह कहना है ‘आईएलओ ब्यूरो फॉर जेंडर इक्वालिटी’ की निदेशक जेन होजेस का।
उनके अनुसार, “अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए वे लम्बे घंटों तक काम कर सकती हैं या फिर निम्न आय वाली कई नौकरियां कर सकती हैं लेकिन इसके बावजूद उन्हें कई अवैतनिक प्रतिबद्धताएं भी निभानी पड़ती हैं।” आईएलओ महानिदेशक हुआन सोमाविया का कहना है कि लैंगिक समानता को किसी भी नीति का प्रमुख सिद्धांत बनाया जाना चाहिए चूंकि आर्थिक संकट का असर सिर्फ महिलाओं पर नही, समाज की समूची स्थिरता पर पड़ रहा है। इसकी वजह यह है कि महिलाएं विभिन्न भूमिकाएं एक साथ निभाती हैं।



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