नई दिल्ली: सौरव गांगुली एक बार फिर विजेता के रूप में उभरे हैं। दादा के साथ खराब व्यवहार करने वाले कोलकाता नाइट राइडर्स के कोच जॉन बुकानन को पहले बाहर का रास्ता दिखाया गया, उसके बाद आईपीएल के तीसरे सीजन के लिए दादा को केकेआर की कमान सौंप दी गई। सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट के ऐसे सोना हैं, जो हर बार ‘आग में तपकर कुंदन’ की तरह निखरता है।
फोटो: वाकई विजेता हैं सौरव गांगुली
वाकई हर मुश्किल के बाद और मजबूत होकर उभरते हैं सौरव गांगुली। उनके कैरियर के डेढ़ दशक इसके सबसे बड़े गवाह हैं। परेशानियों के बाद वे केवल मजबूत होकर ही नहीं उभरे हैं, बल्कि और आगे भी बढ़े हैं। वो ऐसे शख्स भी हैं, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को एक खास आक्रमकता और पहचान दी है।
सौरव गांगुली का जिक्र इस समय इसलिए हो रहा है, क्योंकि वो फिर से कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान बना दिए गए हैं। वो क्रिकेट प्रशासक के तौर पर नई पारी खेलने की भी तैयारी में हैं। क्रिकेट जगत में सौरव का रूतबा एक खास शख्सियत के तौर पर बढ़ता ही जा रहा है।
हाल ही में इंग्लैंड की एक यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित किया, तो आईसीसी ने अपनी व्याखानमाला में बतौर वक्ता उन्हें आमंत्रित किया। यानी वो विश्व क्रिकेट की विशिष्ट जमात में शामिल हो चुके हैं। वो क्या कह कर रहे हैं, क्या कर रहे हैं, उसको न केवल महत्व मिल रहा है, बल्कि लोग मानने लगे हैं कि दादा में दम है। उनके विरोधी भी हैं और चहेते भी। वो अपनी बातें बिना लागलपेट के कहते हैं। अपने स्टैंड पर कायम रहते हैं। उनके आलोचक उन्हें दंभी और स्वार्थी कहते रहे हैं, लेकिन एक बात से किसी को गुरेज नहीं है कि वो बेहतरीन लीडर हैं, वो बदली हुई टीम इंडिया का प्रतीक रहे हैं।
सौरव गांगुली उस बंगाल से ताल्लुक रखते हैं, जहां कभी क्रिकेट हाशिए पर था और फुटबाल को मुख्य धारा का खेल माना जाता था। ऐसे माहौल में उन्होंने क्रिकेट को अपने खेल के रूप में चुना। जिस जमाने में बंगाल टीम से उन्होंने अपने कैरियर को निखारना शुरू किया, तब वहां से नेशनल टीम में जगह बना पाना बहुत मुश्किल था। लेकिन, ये सौरव का सौभाग्य था कि तभी बंगाल से उस जगमोहन डालमिया का भी उदय हो रहा था, जो बाद में भारतीय क्रिकेट के ‘गॉड फादर’ बन गए।
नब्बे के दशक के शुरू में उन्हें वर्ल्ड कप के लिए टीम इंडिया में शामिल किया गया। लेकिन, कप्तान से अनबन के कारण बीच दौरे में ही वापस लौटा दिया गया। तब बहुत से लोगों ने सौरव के करियर को खत्म मान लिया था। लेकिन, इसके चार साल बाद ही इंग्लैंड के खिलाफ इंग्लैंड में ही हुई सीरीज में सौरव की टीम में वापसी हुई। लॉर्ड्स के मैदान पर अपने पहले ही टेस्ट में शतक जड़कर उन्होंने टीम इंडिया में जगह पक्की कर ली। फिर तो वो आगे ही बढ़ते रहे और मजबूत भी होते रहे।
ये वो दौर था जब भारतीय टीम में सचिन तेंदुलकर, मोहम्मद अजहरूद्दीन, नवजोत सिंह सिद्धू, विनोद काम्बली जैसे बल्लेबाज मध्यक्रम की जान थे। लेकिन, सौरव ने मजबूती के साथ खुद को मिडिल आर्डर का दमदार स्तंभ बना लिया। कुछ साल पहले तक उनकी बल्लेबाजी क्षमता पर शक करने वाले लोग भी उनके बदले हुए रूप पर हैरान थे।
सौरव का असली रंग तब दिखा, जब उन्हें कुछ साल बाद ही टीम की कमान सौंपी गई। ये संक्रमण का दौर था। वरिष्ठ क्रिकेटर बाहर हो रहे थे और टीम नए प्रतिभाशाली क्रिकेटरों से लैस हो रही थी। ये उपलब्धि सौरव को जाती है कि इस दौर में वो टीम में एक से एक बढ़कर ऐसे युवाओं को लेकर आए, जो बाद में टीम इंडिया के लिए ‘एसेट’ साबित हुए। ये युवा टीम सही मायनों में सौरव ने गढ़ी थी। इसके हर खिलाड़ी पर सौरव की छाप थी।
ये ऐसी टीम थी, जिसमें बला का आत्मविश्वास था। टीम के लीडर ने इसके हर सदस्य के कानों में ये मूलमंत्र फूंक दिया था कि हर खिलाड़ी विशिष्ट है और हर खिलाड़ी मैच विनर है। ये टीम जब मैदान पर उतरती थी, तो अलग नजर आती थी। उसकी बॉडी लेंग्वेज अलग थी, विरोधियों से निपटने का अंदाज अलग था। ये पूरी तरह आक्रामक थी, जिसे खुद पर विश्वास था। वो मैदान पर हारने के लिए नहीं, बल्कि जीतने के लिए उतरती थी।
पूरी दुनिया ने तब माना कि टीम में आया ये बदलाव कप्तान सौरव गांगुली की देन है। सौरव ऐसे कप्तान थे, जिन्होंने आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी टीमों की अकड़ और हेकड़ी को अपने अंदाज में हवा कर दिया। वो वाकई ऐसे कप्तान साबित हुए, जिनका पाला ऐसी भारतीय टीम से पड़ रहा था, जो हर तरह से ईंट का जवाब पत्थर से देना जानती थी।
दरअसल, यही भारतीय किक्रेट का ‘टर्निंग प्वाइंट’ था। अगर कपिल देव की कप्तानी में हमने ये जाना था कि हममें दम है, तो सौरव की कप्तानी में हमने विरोधी टीमों को इस बात का पूरी तरह से अहसास करा दिया कि हमसे पार पाना बहुत मुश्किल है।
लेकिन, सफलताओं और नई छवि गढ़ने के बावजूद सौरव अपने दुश्मन भी बना रहे थे। इसके साथ ही उनके ‘गॉड फादर’ जगमोहन डालमिया के सितारे भी गर्दिश में आने लगे थे, जिसका सौरव पर सीधा असर पड़ा। न केवल उनकी कप्तानी गई, बल्कि वो टीम से भी बाहर हो गए। लेकिन, सौरव जीवट वाले खिलाड़ी रहे हैं। उन्होंने घरलू क्रिकेट में खुद को फिर साबित किया। साथ ही, बीसीसीआई के तत्कालीन शरद पवार को भरोसे में लिया। उनकी वापसी हुई। उन्होंने खुद को दोबारा साबित किया और फिर पूरे सम्मान के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को विदा भी कह दिया।
इसी बीच वे आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान बने। यहां भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोडा। कोच जॉन बुकानन के साथ ठन गई। नतीजतन, कप्तानी से हटाए गये। लेकिन वे झुके नहीं, बल्कि समय के साथ साबित हो गया कि बुकानन कितने गलत थे। बुकानन को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब दादा फिर शान से केकेआर के कप्तान बन गए हैं। आईपीएल के तीसरे सीजन में वो फिर केकेआर की कप्तानी करते नजर आएंगे। दरअसल वो अगर कहीं अड़ते हैं, तो पूरी तरह। इसके लिए उनके पास अपने तर्क होते हैं। कोई उन्हें तब झुका नहीं सकता। अब तक तो लोगों ने यही देखा है कि हर मुश्किल समय के साथ वो विजयी होकर ज्यादा दमदार होकर उभरे हैं।
बेशक उनकी अगली पारी क्रिकेट प्रशासक की होगी। उन्होंने इसके लिए इरादे जता ही दिये हैं। नजर उनकी बीसीसीआई के अध्यक्ष की कुर्सी पर है, जहां वो अपने अनुभवों के जरिए भारतीय क्रिकेट के लिए कुछ खास करने का सपना देख रहे हैं। रास्ते बनने लगे हैं। पहले चरण में उन्हें बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन तक पहुंचना है। इसके लिए वो कैब के चुनाव में उतरेंगे और फिर वहां से चार साल बाद बीसीसीआई के समर में कूदेंगे। जो लोग उन्हें जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि दादा जो चाहते हैं, करके दिखाते हैं।



<< पिछला अगला >>