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हिन्दी लेखकों एवं कवियों का रचना संसार
Posted On : 12/10/ 2009 Bookmark and Share
झारखंड : इन दिनों झारखंड के कवि, साहित्यकार एवं लेखकों की चर्चा अखबार के माध्यम से बराबर हो रही है। कवियों के कई वरिष्ठ कलमकार झारखंड के कवियों एवं लेखकों के नाम कमोबेश गिना रहे हैं। उनकी कृतियों की चर्चा कर रहे हैं। लेकिन उन आलेखों को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि पलामू झारखंड का अंग ही नहीं या झारखंड के मानचित्र के बाहर है। उन आलेखों मे पलामू के लेखकों एवं कवियों का कही नामोनिशान नहीं, कही कोई चर्चा नहीं जो कि पलामू के लेखक उतने ही पुरातन काल से हैं, जितना पुरातन पलामू किला है।

एक ओर पलामू मे वन-सम्पदा प्रचुर मात्रा में है, तो दूसरी ओर यहां लेखक, कलाकारों एवं फनकारों की कमी नहीं। पलामू की पथरीली धरती पर महुआ खाकर एव एवं ओलो की मार सह कर भी यहां के साहित्यकार-कलमकार निरंतर साहित्य साधना करते रहे हैं। पलामू की धरती को यहाँ के कलमकार अपनी-अपनी जीवनत कालयजी रचनाओं से सिंचित आहलाक्षित एवं गौरवान्वित करते रहे है। अनक लखक, कवि अपनी रचनाओं के माध्ययम से सम्मानित होते रहे हैं। कहानी, नाटक उपन्यास, गजल लघुकथा, संस्मरण, आलोचना, समीक्षा, शोधग्रथ, शोधप्रबन्ध, खंड काव्य इत्यादि साहित्य की विविध विधओं में यहाँ के लेखकों की कलम निरंतर चल रही है। इन रचनाकरों मे कुछ अनुभव प्राप्त प्रौढ़ रचनाकार तथा कुछ नयी पीढ़ी भी आते है।

पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों मे सर्व प्रथम पंडित रामदीन पाण्डेय का नाम सामने आता है। श्रावण शुक्ल सप्तमी 1852 को जन्में पंडित रामदीन पाण्डेया की कई पुस्तकों का प्रकाशन हुआ, जो हिन्दी एवं संस्कृत मे हैं। इनमें सौरनन्दन काव्यम, कुमार दासस्य, जानकी हरण्म्, बिहरे जैनधर्म, ज्योत्सना (नाटक) जीवन ज्योति, जीवन कण, जीवन यज्ञ, जीवन जिज्ञासा, (नाटक) विद्यार्थी, चलती पिटारी, वासना (उपन्यास़ काव्य की उपेक्षिता (आलोचना) प्राचीन भारत की संग्रमिकता (शोधग्रन्थ), हिन्दी में स्लैंग प्रयोग, (निबन्ध), देव काव्यम, भारतनेतृप्रकाशम वापोश्चरित (संस्कृति), पलामू का इतिहास, पंच एकांकी व दो एकांकी मुख्य हैं।

हवलदारी राम गुप्त हलधर की बहुचर्चित पुस्तक ‘पलामू का इतिहास’ तब प्रकाशित हुई, जब पलामू का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं था। महावीर वर्मा ने भी पलामू का संक्षिप्त इतिहास कोयल के किनारे-किनारे लिखा था। पंडित रामवतार शर्मा, मोती लाल अग्रवाल, पं. जर्नादन द्विवेदी दीन ने भी अपने जीवन काल में दो तीन पुस्तकों की रचना की थी और साहत्य जगत में एक स्थान हासिल किया था। 30 अगस्त 1920 में जन्में ज्योति प्रकाश की कई पुस्तके प्रकाशित हुई। इनमें झिलमिल (उपन्यास), सीधा रास्ता (बाल साहित्य) बुल-बुल, दिल की गहराई से, धूप और छाया (कहानी संग्रह) तथा ज्योति प्रकाश व्यक्तित्व और कृतित्व। इनके बाद की पीढ़ी के साहित्यकारों की उपलब्धि भी कम नहीं है।

16 मई 1927 को जन्में डा. जगदीश्वर प्रसाद की अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें छायावाद के लाक्षजिक प्रयोग, शब्दशक्तियों का विकास मूलक अध्ययन, रीति काव्यः एक नया मूल्यांकन, कबीर की प्रगतिशील चेतना, नन्ददास: दशंन एवं काव्य, भक्त सिद्धांत: एक विनियोगात्मक व्याख्या, निराला के काव्य की सांस्कृतिक चेतना, प्रकाशवीथी स्वछन्दतावाद और ठाकुर की कविता, तुलसी का मानवतावाद, शब्द-शक्ति: हिन्दी विवेचकों की दृष्टि में हिन्दी समीक्षा के आयाम शोध ग्रन्थ), गूंज अन्तर की, सर्जना के पंख, शिखर लक्ष्य हे (कविता संग्रह़, प्रतिशोध खण्ड काव्य, साहित्यधारा, चिन्तन की रेखाएं, गीता दर्शन (निबन्घ संग्रह़, इतिहास रचता हूद्द। सितम्बर 1933 को जन्में दीनेश्वर प्रसाद दीनेश की अब तक पांच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें वजीरा पानी पिला, (कहानी संग्रह़), बेचारा केवट उदास है, संझवाती (काव्य संग्रह), बज्जिका बरवै रामायण (महाकाव्य) एवं   डीह कथा (परिकथा) है।

21 अगस्त 1935 को जन्में सत्यनारायण ‘ नाटे ’ की अब तक छः पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें प्रेमचंद (जीवनी), भारखंड के सपूत, भारखंड लोककथाएं, युगबोध (लघु कथा संग्रह), जबडे़ अकाल के, गंगू और पेड़ (चित्रकथा), सत्यनारायण नाटे के लतीफे हैं। आकृतियाँ उभरती हुई, मोर के पंख, मोर के पांव तथा लघुकथाएं अंजुरी भर संग्रह के सहयात्री हैं। 15 फरवरी 1938 को जन्में डा. ब्रज किशोर पाठक की दो पुस्तके अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं- शहीद नीलाम्बर-पीताम्बर व साहित्यकार अशोक लव बहुआयामी हस्ताक्षर। 1938 में जन्में डा. नागेन्द्र नाथ् शरण हिन्दी और अंग्रेजी में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। हिन्दी एवं अंग्रेजी में इनकी अब तक आठ पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें -गीत मैं गाता रहा, बदलते मौसम में (कवित संग्रह), लघुकथाएं उनकी और मेरी, बिमर्श को बहाने (निबन्ध संग्रह), मैसेज आफ द फ्लूट (अंग्रेजी काव्य), नीलाम्बर, पीताम्बर (द हीरोज ऑफ 1857 रन पलामू) एवं ए क्रिटिकल स्टडी ऑफ द नॉवेल आफ आर.के. नारायण।

(4 अप्रैल, 1938 को जन्में सिद्धेश्वर नाथ ओंकार की अब तक पांच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं प्रकाशित पुस्तकों में क्रान्ति विविधा, क्रान्ति चेतना, श्राद्धाजंलि (काव्य संग्रह) एवं अखिल प्रबध काव्य है। 7 जनवरी, 1941 को जन्में जर्नादन प्रसाद की अब तक पांच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें मेरी मूंछ कट गयी, गुदगुदी, सबरंग, राष्ट्रीय गीत एवं हरि नाम भजन कर लो हैं। 1947 को जन्में नेश नाहर की दो पुस्तके प्रकाशित हैं मांडवी (खण्ड काव्य) और छिपे फूल उभरे कांटे। 20 जुलाई,1948 को जन्मी डा.लक्ष्मी विमल की अब तक चार पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें स्पन्दन और अनुगूंज (काव्य संग्रह) सादा लिफाफा (लघुकथा संग्रह), गुचां-ए-गजल (गजल संग्रह) त्रिमूलधारें (महिमा संग्रह) इसके अतिरिक्त उर्दू के मशहूर शायर नादिम बल्खी की एक पुस्तक ‘शब्दो की आवाज’ इन्होने हिन्दी मे लिपयांतर किया है। इनका शोध प्रबन्ध ‘सूरदास का शील विधान’ भी यत्रस्थ है। सन् 2006 में आकल मृत्यु की शिकार श्यामा शरण श्री लेखनी तो अब अवरुद्ध हो चुकी हैं, परन्तु उनकी भी 6 पुस्तकें प्रकाशीत हो चुकी हैं।

नदी समुद्र और किनारा, जीवन धारा (कहानी संग्रह), जीवन तेरे रंग अनेक (कविता संग्रह) लघुकथाए उनकी और मेरी (लघुकथा संग्रह) धूप जब आयी आंगन में (गजल संग्रह ) का न करे अबल प्रबल (निबंध संग्रह), यादों मे बसे हो तुम (उपन्यास)। 23 सितम्बर ,1948 को जन्मी इन्दु तारक की दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं कैसे चुप रहूं और उपालभ्भ (काव्य संग्रह) पलामू की पहचान पदर्शित करने वाला अमर लोकगीत ‘सुन-सुन परदेशी पलामू जिला देख ले के गीतकार श्री हरिवंश प्रभात की रचनाओं मे पलामू जिले का समग्र दिग्र्शन होता है। 5 नवम्बर, 1949 को जन्में हरिवंश प्रभात की अब तक पांच पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें बढ़ते चरण, खुलती पंखुडिया, गी मेरी बांसुरी के, फिर भी मै हूं, बूंद-बूंद  सागर ये सभी (काव्य संग्रह है)। 30 जून 1953 को जन्में डॉ. राम जी को अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे अनुगूंज  तुम्हारे लिए (गजल संग्रह) कहानी संग्रह, आघात एवं पगडंडिया (उपन्यास) हैं।

उर्दू के मशहुर शायर नादिम बल्खी की तीन पुस्तकों का हिन्दी लिपयान्तर भी इन्होंने किया है, जिसमें त्रिवेणी का पानी, कहभुकरनियां शामिल हैं।

मेदिनीनगर के वर्तमान सिविल सर्जन डा० कामेन्द्र सिंह की भी दो पुस्तकें काले बगुले और कृष्णा प्रकाशित हुई हैं। पलामू वासी महेन्द्र उपाध्याय की दो पुस्तकें रावण जिन्दा है तथा एक गजल संग्रह भी प्रकाशित है। पंडवा मोड़ के राकेश सिंह की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। श्याम बिहारी सिंह श्यामल की तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं धपेल, अग्निपुरुष ( उपन्यास, तथा प्रेम के अकाल में । डा० विष्णुदेव दूबे ने भी अध्यात्म पर एक पुस्तक लिखी हैं, जो 2008 में प्रकाशित हुई पलामू के ग्रामीण क्षेत्र से साहित्य लेखन मे अग्रणी स्थान हासिल करने वाले रचनाकारों मे राकेश कुमार सिंह कई तथा जपला वासी  विपिन बिहारी सिंह की पुस्तके प्रकाशित हुई हैं और सम्मान भी हासिल किया है।

गोर्वद्धन सिंह की एक पुस्तक (गीता से सम्बंधित) प्रकाशित हुई है। उदित तिवारी जी की भी एक पुस्तक प्रकाशित है। यहां के वरिष्ठ कवि नरेश प्रसाद नाहर की कृतियों विस्मृत करने की गुस्ताखी कोई नहीं कर सकता  उनकी दो पुस्तके छिपे फुल, उभरे काटे गीत संग्रह और माण्डवी ने काफी  प्रसंसा बटोरी है। इनके अलावे कई लेखक अनवरत लेखन कार्य कर रहे हैं, परन्तु अर्थभाव में वे अपनी पुस्तकें प्रकाशित नही करा पाते हैं। निरंतर लेखन कार्य में लगे लोगो में प्रो० सुभाष चन्द्र मिश्रा, प्रो० के.के. मिश्रा, कृष्ण देव झा, उदित तिवारी, विजय रंजन, तारिणी प्रासाद, सुषमा श्रीवास्तव, विनीत असर, प्रमोद अग्रवाल आदी कई कवि शामिल हैंै। अभी हाल ही में 75 वर्षीय रामचन्द्र प्रसाद की पुस्तक बिखरे मोती काव्य संग्रह प्रकाशित हुई है। रामचन्द्र प्रसाद पुलिस विभाग मे हिन्दी दम तोड़ती है उस विभाग का व्यक्ति भी हिन्दी की ज्योति को जलाए रखते हुए कविता लेखन का कार्य करता है। अर्थात पलामू की बंजर धरती पर कई पौधे ऐसे भी हैं जो विपरीत जलवायु और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी लेखनी को सुखने नहीं देते है।
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