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लोकसभा चुनावों में अखबारों ने तोड़ा पाठकों का भरोसा
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Posted On: 16-Jul-2009 10:48:35 AM Font Size: Increase Font Size Decrease Font Size

लखनऊ: 15वीं लोकसभा चुनाव के दौरान लखनऊ के चार अखबारों का अध्ययन करने पर यह ज्ञात हुआ कि कुछ राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों ने व्यवस्थागत ढंग से प्रायोजित खबरें- जो प्रत्येक दिन अखबार में एक ही अकार की और एक ही स्थान पर देखने को मिलीं- छपवाई हैं। ऐसा करके अखबारों ने अपने पाठकों के साथ विश्वासघात किया है क्योंकि यह पाठक के उस मूल विश्वास को तोड़ता है, जिसके आधार पर निष्पक्ष एवं संतुलित खबर पढ़ने के लिये पाठक अखबार खरीदता है।

चुनाव के दौरान कुछ अखबारों में, समाचार, विचार और प्रचार के बीच कोई भेद ही नहीं रह गया था। कुछ अखबारों ने तो छोटे अक्षरों में '''advt' या इस तरह का कोई संकेत छापा, जिससे मालूम हो कि प्रकाशित सामग्री प्रायोजित है। लेकिन, कुछ अखबारों ने यह भी छापने का कष्ट नहीं उठाया। इन ख़बरों को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए समाचार पत्रों ने अल्पकालिक एजेंसिया भी बना लीं, जो स्पष्ट नहीं है कि समाचार एजेंसियां हैं या विज्ञापन एजेंसियां?

हमने उम्मीदवारों द्वारा छपवाई गई प्रायोजित ख़बरों को विज्ञापन मान कर अखबार के विज्ञापन दरों से उनके द्वारा इन ख़बरों को छपवाने में हुए खर्च का आकलन किया। इसके अनुसार लखनऊ के एक उम्मीदवार डॉ अखिलेश दास गुप्ता ने सिर्फ एक ही अखबार में 25 लाख रूपये, जो एक उम्मीदवार द्वारा लोकसभा चुनाव में खर्च की अधिकतम सीमा है, से ज्यादा खर्च किए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि चुनाव आयोग अपनी आचार संहिता के उस उल्लंघन को गंभीरता से लेगा।

यह स्पष्ट है कि राजनितिक दल एवं उम्मीदवार जो, अन्यत्र चुनाव आयोग की आचार संहिता का गंभीरता से पालन करते हैं, अपने प्रचार हेतु मीडिया का जम कर दुरूपयोग करते हैं। और, अफ़सोस की बात यह है कि मीडिया भी अपना दुरूपयोग होने देती है। दोनों के खिलाफ ही कठोर कारवाई की आवश्यकता है।

हम उम्मीद करते हैं कि प्रेस काउंसिल समाचार पत्रों पर अंकुश लगाएगी तथा उन्हें 'प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की चुनाव के दौरान पत्रकारिता हेतु मार्ग-निर्देश 1996' का पालन करने के लिए बाध्य करेगी। कोई भी समाचार पत्र, जो इस मार्ग-निर्देश का उल्लंघन करता है, उसके खिलाफ कारवाई होनी चाहिए। निबंधक (समाचार पत्र) को ऐसे समाचार पत्रों का पंजीकरण रद्द कर देना चाहिए।

चुनाव आयोग जिस तरह वह अन्य चुनाव खर्चों पर पैनी नज़र रखता है, उसी तरह से उसे समाचार पत्रों में छप रहे विज्ञापनों या प्रायोजित समाचारों के खर्च का हिसाब-किताब भी लेना चाहिए। राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किया गया पैसा भी उम्मीदवारों के खाते में जुड़ना चाहिए। उम्मीदवारों की तरह रजनीतिक दलों के भी चुनाव प्रचार के खर्च पर या तो सीमा तय होनी चाहिए अन्यथा उनके खर्चे को सभी उम्मीदवारों में बराबर-बराबर बाँट दिया जाना चाहिए।

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