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यूपी : ए.एस.आई. की 35वीं वार्षिक संगोष्ठी आज से शुरु

ए.एस.आई. की यूपी इकाई की तीन दिवसीय 35वीं वार्षिक संगोष्ठी, (यू.पी.ऐसिकोन 2001) आज लखनऊ में आरम्भ हुई। इस वर्ष इस संगोष्ठी का आयोजन, लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के शल्य चिकित्सा विभाग, और सेल्सी, यूपी इकाई के संयुक्त तत्वाधान में, डा. रमा कान्त की अध्यक्षता में और डा पाहवा तथा डॉ. सुरेश कुमार के प्रबंधन में किया जा रहा है।

कांफ्रेंस के प्रथम दिन शल्यक्रिया कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें सिंगल पोर्ट सर्जरी (एक चीरे से की जाने वाली शल्य क्रिया), एवं नोट्स ( मुख, मूत्र मार्ग अथवा गुदा के मार्ग से की जाने वाली शल्य क्रिया) के माध्यम से गर्भाशय, पित्त- थैली एवं हर्निया के ऑपरेशन किए गए।

इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए आए लगभग 500 चिकित्सकों को मिनिमल एक्सेस सर्जरी ( सूक्ष्म चीरे के द्वारा होने वाली शल्यक्रिया) की नवीनतम विधाओं से परिचित होने का सुअवसर मिला। इस कार्यशाला का लाभ उन मध्यम वर्गीय मरीजों को भी मिला जिनका ऑपरेशन, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दिग्गजों ने किया।

इस कार्यशाला में प्रसिद्ध शल्य चिकित्सकों का हस्त कौशल देखने को मिला, जिन्होनें ‘बड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए’।

मुंबई से आए डा. प्रकाश राव, (जिन्हें भारत में सिंगल पोर्ट सर्जरी का जनक कहा जाता है) ने बिना चीरा लगाए, पित्त की थैली का ऑपरेशन किया। पुणे के डा शैलेश ने सिंगल पोर्ट के द्वारा एक 35 वर्षीय महिला के गर्भाशय की शल्यक्रिया करी।

उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध लेप्रोस्कोपिक सर्जन डा मौर्या ने एक नयी विधा ‘एन.डी.वी.एच.’ के द्वारा गर्भाशय का ऑपरेशन किया।
दूरबीन विधि से हर्निया के ऑपरेशन दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान से आए डा मिश्रा ने किए।

बगैर चीरा लगाए, एक अत्याधुनिक विधि के द्वारा बवासीर का इलाज करने में सिद्धहस्त, डा रमा कान्त ने भी अपने कौशल का परिचय इस कार्यशाला में दिया। इस विधि में रोगी कुछ ही घंटे अस्पताल में रह कर, दूसरे दिन से ही सामान्य रूप से कार्य कर सकता है।

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है कि शल्यक्रिया की ये असाधारण विधाएं, सादारण जनता तक पहुँच सकें। जब अधिक से अधिक संख्या में शल्य चिकित्सक, इन नयी विधाओं को अपना कर जन साधारण को इनसे होने वाले लाभ के बारे अवगत करायेंगे, तब शल्य चिकित्सा की ये नवीनतम उपलब्धियों का लाभ गरीब रोगियों तक पहुँच पायेगा।

हालांकि, सूक्ष्म चीरे वाली शल्यक्रिया, परम्परागत शल्यक्रिया के मुकाबले महंगी मानी जाती है, परन्तु इसके अनेक लाभ हैं। डा पाहवा के अनुसार, लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से की गयी शल्यक्रिया में ऊतकों का क्षय कम होता है , ऑपरेशन के उपरांत पीड़ा भी कम होती है, अस्पताल में रोगी को कम समय के लिए रहना पड़ता है और वो अपनी दिनचर्या पर जल्द से जल्द वापस लौट सकता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया वास्तव में, रोगी के लिए अधिक आराम देह और कम खर्चीली साबित होती है।

सी.एस.एम.एम.यू. जैसे अस्पतालों में आने वाले 60 से 70 फीसदी मरीज़, गरीब होते हैं। अत: इस प्रकार की कार्यशाला से शल्य क्रिया की नयी विधाओं को सभी के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। डा रमा कान्त के शब्दों में ‘ कुछ बड़ा हासिल करने के लिए, बड़ा सोचना भी पड़ता है। यह संगोष्ठी, हम सभी की सोच को एक नयी दिशा देने में सक्षम होगी।'

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