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प्रिंट मीडिया का स्थान तेजी से लेते इलेक्ट्रानिक मीडिया
Posted On : 26/10/ 2009 Bookmark and Share
इलेक्ट्रानिक मीडिया ने घर-घर की कहानी व छोटी-छोटी खबरों को जिस मिर्च मसाले के साथ परोसा है शायद उसी से मुकाबला करने की होड़ में प्रिंट मीडिया भी ज्यादा स्याही खपाने लगा है। सेक्स, बालात्कार, यौन उत्पीड़न, देह व्यापार व ऐसी खबरों पर। रही सही कसर स्वयं प्रिंट मीडिया के उभरते लोगों ने पूरी कर दी है। अभी तक यदा कदा कहीं किसी महानगर या दूर-दराज के कस्बे से ही यौनाचार, सेक्स, बालात्कार व सेक्स स्कैंडल की खबरें मिलती थीं और इस पर भी समाज की इतनी तीखी प्रतिक्रिया होती थी, इतना आक्रोश व्यक्त किया जाता था कि आने वाले समय में एक बड़ा ‘डर’ पैदा हो जाता था और बालात्कार जैसी घृणित व कुत्सित कोशिश से पहले व्यक्ति दस बार सोचता था, लेकिन आज किसी दिन और किसी भी अखबार का पन्ना षायद ही इन सुर्खी से बचता हो। अभी कुछ सालों पहले तब अखबारों के तीसरे पेज के छोटे से, कोने में छपने वाली खबर की तरक्की चैंकाने वाली है व बिक्री की होड़ में मुख्य पृष्ट की लीड स्टोरी तक ही जगह इस खबर ने लेनी शुरू कर दी है।

   ‘एक्सक्लूसिव’ के श्रेय लेने की होड़ के चलते आज चटखारे की खबर, राष्ट्रीय या प्रेरणादायी खबरों पर हावी हो चली हैं और मुख पृष्ठ तक जा पहुंची है तो यह दो ही कारणों से संभव लगता है या तो प्रेरणावाली व राष्ट्रीय महत्व की खबरें दुर्लभ हो गयी हैं अथवा समाज के मानव मूल्य और कसौटी बदल गये हैं। हो सकता है कि पहले भी ऐसी खबर बहुतायत रहती हो, लेकिन वे मीडिया के पकड़ से बाहर रही हों। मीडिया की पहुंच इन खबरों तक न हो अथवा मीडिया के मानक ही दूसरे हों या फिर मीडिया इन्हें अर्थहीन व महत्वहीन मनता हो या फिर इन्हें छापने से डरता हो। मगर इन दिनों सब कुछ इतना बदल गया है कि अब ये खबरें न आक्रोश पैदा करती हैं न जुगुप्सा जगाती हैं और न ही संवेदनाओं को झिंझोड़ पाती हैं और यदि ऐसा हुआ है, (और निश्‍िचत हुआ है) तो यह प्रगति नहीं वरन शर्म और चिंता का विषय है।

एक यक्ष प्रश्‍न यहां अखबरनवीसों, संपादकों व चैनलों के मालिकों व समन्वयकों को पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर मीडिया का कर्तव्‍य, दायित्व, भूमिका व पहचान क्या है? और क्या हो? क्या महज बिना आफ्टर इफेक्ट की परवाह किये बिना चिंतन किये स्वयं को नंबर एक बनाने की होड़ अथवा समाज का दर्पण कहलवाने का दंभ पाले दनादन धंधाधुंध खबरें छापना उसकी पहचान होनी चाहिए या स्वयं को निष्पक्षता या तटस्थता का प्रतीक कहकर समाज की गंदगी को सतह पर लाना जरूरी है अथवा कहीं पेंदी में दबी पड़ी अच्छायी को प्रकाश में लाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण और आवष्यक होना चाहिए।

ठीक है, भौतिकता के युग में बुराई बढ़ी है, अनैतिकता पनपी है और बहुत कुछ ऐसा बढ़ा है, जो नहीं बढ़ना चाहिए था पर सच यह भी है कि अभी भी सत व अच्छाई खत्म नहीं हुए हैं। थोड़ा सा नेपथ्य में भले ही पहुंच गये हैं। इस सारे भ्रष्ट-आचरण कर कड़ी टिप्पणी करना, नजर रखना यदि मीडिया का हक है तो अच्छाई को बढ़ावा देना उसका दायित्व और कर्तव्य दोनों है वर्ना समाज भ्रट हुआ है,तो मीडिया को भी मतिभ्रष्ट की संज्ञा पाने को तैयार रहना चाहिए।

आज जैनेट का चाली प्रकरण, अनारा गुप्ता सी.डी कांड, फैशन शो के लगभग नग्न मॉडलों के चित्र, किसी फिल्मी तारिका का चुंबन प्रकरण, बैंडिट क्वीन या किसी अन्य फिल्म में कला के नाम पर परोसी जाने वाली वीभत्स नग्नता, किसी के सहवास या रति दृश्‍यों के एसएमएस आज इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के लिए मुख्य सुर्खियां हो गई हैं, तो यह समाज में पनपती गंदगी के साक्ष्य तो हैं ही, मीडिया के बिकाऊ माल परोसने की लम्पटता को भी उजागर करता है और लोकतंत्र के चैथे खंभे का यह क्षरण लज्जाजनक होने के साथ-साथ खतरनाक भी है और इस खतरे से देश, समाज  और हमें स्वयं ही निपटना होगा।
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