प्रभाष जी का असमय चले जाना हिन्दी की दुनिया की गंभीर क्षति है। सर्वथा अपूरणीय क्षति। प्रभाष जी ने अपनी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के नाते बहुतेरी भूमिकाओं को चुना और उन भूमिकाओं को उनके उत्कर्ष तक भी पहुंचाया, पर सारी भूमिकाओं में केन्द्रीय होते थे, उनके स्पन्दन। उनके लिखने, बोलने में हम उन स्पन्दनों को महसूस कर सकते थे, जो किसी भी राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, साहित्य और खेल के विषय के सम्पर्क में आने पर उनके भीतर उमड़ते थे। हिन्दी में अपने स्पन्दनों को इतने मुखर बना देने वाले प्रभाष जी शायद इकलौते व्यक्ति हैं, जो अपने शान्त, पर आंदोलनकारी तेवर के बावजूद आपसी संवाद में यकीन रखते थे। अपने अंतःकरण में भरोसा रखने वाले प्रभाष जी शायद इसलिए इतनी अगाध ऊर्जा से अपनी संवेदनाओं को प्रकट कर सके कि वे आम इंसान के दुःख-दर्द को शिद्त से महसूस करते थे। उनके सरोकारों का फलक इतना व्यापक था, फिर भी निरन्तर विपरित होते जा रहे समय में वे अपने सरोकारों को लेकर व्याकुल और उद्धिग्न होने लगे थे। इसलिए उनमें आवेग और आवेश था, उन मुद्दो पर जो आम इंसान को उसकी जीवन की लय से ही विस्थापित कर रहे थे। इसलिए, उनकी पत्रकारिता में सत्ता की आलोचना बेबाक है और उन्होने सत्ता समीक्षा को विरोध, प्रतिरोध के तेवरों में स्थापित कर रिर्पोटिंग विधा के व्याकरण को ही बदल डाला। दमन को अपनी नियति मान लेने वाले समझौतापरस्त हिन्दी प्रदेशों में नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाने का शंखनाद व्यापक अर्थो में सांस्कृतिक हस्तक्षेप था। इसलिए उन्होने निस्पन्द, ठंडी तथाकथित वस्तुनिष्ठ रिर्पोटिंग की जगह स्वाभिमान और गरिमा से भरी भाषा शैली विकसित की। हम देख पाते है कि जनसत्ता में उन्होने रिर्पोटिंग, संपादकीय और लेखों में सत्ता तंत्र से सवाल पूछने की तेजस्वी परम्परा विकसित की।
आंदोलनकारी तेवर की विरासत उन्हें सर्वोदयी आंदोलनों में जुड़ाव से मिली थी। इसलिए इस आंदोलनकारी मन के नाते वे भूदान आंदोलन, दस्यु समर्पण, नर्मदा बचाओ आंदोलन, आपातकाल विरोध, सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलनों में शिद्दत से जुड़े रहे। हिन्दी पत्रकारिता में वे ऐसे दुर्लभ व्यक्ति थे, जिन्होने जीवनपर्यन्त जमीनी आंदालनों से जुड़ाव रखा। जनसत्ता में भी उन्होने आंतरिक लोकतन्त्र की मिसालें स्थापित की और वामपंथियों, समाजवादियों और दक्षिपंथी रूझान वाले व्यक्तियों की समवेत टीम तैयार की। उदारता की यही मिसाल हो सकती है कि विभिन्न विचारधाराओं को एक साथ इकट्ठा मंच मिले, जहां असहमतियों के साथ संवाद किया जा सके। उनकी प्रयोगधर्मिता इतनी नायाब होती थी कि जनसत्ता ने लोक रूझान के शास्त्रीय मानक स्थापित किये। पत्रकारिता में पेशेवर मानदंडों को कभी भी उन्होने सामाजिक उत्तरदायित्व पर हावी होने नही दिया, इसलिए मनोरंजनवादी चिकनी-चुपड़ी पत्रकारिता के बरक्स उन्होने खुरदरी, देशज और तेजस्वी पत्रकारिता की परम्परा विकसित की। संघर्ष का माद्दा रखने वाले गांधीवादी अब सार्वजनिक क्षेत्र में दुर्लभ ही हैं।
वे परम्परा के मर्मज्ञ तो थे, पर परम्परा के नाम पर चली आ रही कुरीतियों के खिलाफ आवाज भी उठाते थे। वैश्वीकरण के खिलाफ आंदोलन में विगत दो दशकों से सक्रिय थे और अपनी वैचारिक दृष्टि से उन्होने हिन्दी पाठकों को पहले से ही इसके घातक खतरे बता दिये थे।
ऐसे सैकडों दृष्टान्त भांति-भांति की पृष्ठभूमियों की व्यक्तियों के मिलेगें, जिन्होने उनकी आत्मीयता को चखा। वे हर मिलने वाले साधारण से साधारण व्यक्ति में भरपूर बड़प्पन अपनी ऊष्मा से पैदा करते थे। इस बाजारू होते जा रहे समय में अगर हम उनकी परम्परा को बसाहट के और फलने-फूलने के अवसर दे, तो शायद हम उनकी आंदोलनकारिता को सजीव बना सकेंगे। पर, ऐसा होना फिलहाल सम्भव नही दिखता क्योंकि कुछ व्यक्ति अपने समय के इतने आगे होते हैं कि उनकी परम्परा स्मृतियों में तो रहती है, पर जीवन के रणक्षेत्र में वो केवल पुरातात्विक महत्व की ही रह पाती हैं। प्रभाषजी की आंदोलनकारिता को हम अपनी श्रदा बुद्धि से और पूजा भाव से कहीं पंगु तो नही बना देगें?




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