नई दिल्ली: निमोनिया का इलाज सस्ता एवं हर जगह उपलब्ध है। निमोनिया के लिए न तो वैक्सिन शोध चाहिए, न नई दवाएं, न नई जांचें क्योंकि प्रभावकारी इलाज सस्ता है और उपलब्ध भी। इसके बावजूद निमोनिया से हर साल 20 लाख बच्चों (5 साल से कम उम्र) की मौत होती है।
"निमोनिया होने पर फेफड़ों में हवा की थैलियों में संक्रमण या बलगम भर जाता है। गम्भीर निमोनिया घातक भी हो सकती है।" यह कहना है प्रोफ़ेसर (डॉ.) रमाकान्त का, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (2005) प्राप्त चिकित्सक हैं और लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय में सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।
डॉ. डॉ. रमा कान्त कहते हैं, "निमोनिया के लक्षण हैं- सामान्य से अधिक तेज़ सांस या सांस लेने में परेशानी, सांस लेते या खांसते समय छाती में दर्द, खांसी के साथ पीले, हरे या जंग के रंग का बलगम, बुखार, कंपकंपी या ठंड लगना, पसीना आना, होंठ या नाखून नीले होना" आदि।
डॉ. रमा कान्त कहते हैं कि निमोनिया की जांच - "स्पूटम कल्चर" - अधिकांश स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध होती है। इसके बावजूद निमोनिया से हर 15 सेकंड में एक बच्चा मर जाता है, जो बेहद खेद की बात है।
"आख़िर निमोनिया से बच्चे क्यों मर रहे हैं?" यह सवाल जन-स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं को आतंकित करता रहा है। यही वजह है कि इस वर्ष 2 नवम्बर 2009 को पहले विश्व निमोनिया दिवस मनाया जा रहा है। तपेदिक (टी.बी.) एवं अन्य फेफड़े के उन्मूलन के लिए समर्पित अंतरराष्ट्रीय संस्था (इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्टटुबेर्कुलोसिस एंड लंग डिसीस - "द यूनियन") भी निमोनिया की रोकधाम एवं उन्मूलन के लिए समर्पित है।
द यूनियन के एक शोध में पाया गया कि ऐसे 68 देशों में, जहाँ निमोनिया से होने वाली मौतों की दर अधिक है, सिर्फ़ 32 प्रतिशत (निमोनिया से पीडि़त बच्चों या जिन बच्चोंक को निमोनिया होने की आशंका होती है) बच्चों को ही उचित दवा मिल पाती है। 68 प्रतिशत बच्चे, जिनको निमोनिया होने की आशंका होती है, उपचार से वंचित रह जाते हैं। यह अत्यन्त दुःखद है क्योंकि निमोनिया का उपचार सस्ता है और स्वास्थ्य केन्द्रों में उपलब्ध भी।
यदि विश्व को 2015 तक बच्चों की मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक कम करने का सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (मिलिनिम डेवेलपमेंट गोल) हासिल करना है, तो निमोनिया नियंत्रण एवं उन्मूलन के लिए कार्यक्रमों को प्रभावकारी ढंग से लागू करना बहुत जरूरी है।
(बाबी रमाकांत, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक द्वारा 2008 में पुरस्कृत हैं और सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (www.citizen-news.org) के संपादक हैं। ईमेल: bobbyramakant@yahoo.com)



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