झारखंड के अधिसंख्य जिलों के विभिन्न हिस्से में हजारों बाल श्रमिकों का शोषण बदस्तूर जारी है। इन श्रमिकों के उद्वार तथा उन्हे शोषणमुक्त कराने के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर बनाये गये विविध कानून इस जिले में निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। इन श्रमिकों के पुनर्वास के लिए कोई कारगर कदम उठा पाने में जिला प्रशासन भी बुरी तरह विफल रहा है। घोर आर्थिक,शरीरिक और मानसिक शोषण के शिकार इन मासूम श्रमिकों को होटलों, दुकानों, गुमटियों या मोटर गैराजों में देखा जा सकता है, जहां ये एक दिन के भोजन और चंद नोटों की खातिर अपनी जिन्दगी के सुनहरे क्षणों को हवन कर देते हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक इन बाल श्रमिकों में से कुछ तो अनाथ होते हैं और कुछ अपने मां-बाप की सहमति और उनके आदेश से यह सब कुछ करने को विवश हैं। खेलने-खाने की उम्र में इन नौनिहालों की इस नारकीय जिन्दगी जीने की परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में उनकी स्वयं तथा उनके परिवार के सदस्यों की भूख है। प्रायः मामलों में परिवार के बोझ को उठाने में अक्षम ओर असमर्थ माता-पिता विवश होकर अपने कलेजे के टुकडे़ को शोषण की इस ज्वाला में धकेल देते हैं। वहां उन्हे मिलता है रोटी का टुकडा,जो इतना छोटा होता है कि शायद उससे उस मासूम की भी पेट न भरती हो, रोज दिन-रात मजदूरी करता है। इन अबोध नन्हें बाल श्रमिकों की सबसे बडी त्रासदी यह है कि इनके नियोक्ता इन्हे भर पेट भोजन तो नहीं जी भर कर गालियां और उत्पीड़न जरुर करते हैं, जिसके फलस्वरुप कोमलमति ये बालक जवानी की दहलीज पर कदम रखने से पहले शारीरिक और मानसिक रोगों के शिकार हो जाते है और जब उन्हे परिवार का बोझ उठाना चाहिए, तब वे किसी के काबिल नहीं रह जाते है। सर्वेक्षण के क्रम में यह भी पता चला है कि उम्र की पहली दहलीज पर कदम रखे इन नौनिहालों को खैनी,बीडी, सिगरेट या ऐसे ही नशें की आदत लग जाती है जो अंततः उन्हे कहीं का नही छोड़ता । कई बार बच्चे अपनी इन आदतों की पूर्ति जारी रखने के लिए भी मजदूरी करते हैं। इन मजबूर मासूमो की बर्बादी के लिए बहुत हद तक समाज का तथाकथित सभ्रांत और उच्च वर्ग जिम्मेदार है जो घरेलू नौकरों के रुप में इन नौनिहालों की खरीद-बिक्री करते हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1986 में बने बाल श्रमिक अधिनियम में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से किसी भी प्रकार का काम उम्र के बच्चों से किसी भी प्रकार का काम लेने का पूर्ण निषेध है। संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 39 (3) में भी इस बात का जिक्र है कि बाल वर्ग (14 वर्ष तक) की मूल भावनाओं को आघात पहुंचाने वाली कोई बात नही होनी चाहिए और न ही उनसे अपेक्षा से अधिक कार्य लिया जा सकता है। बच्चों के विकास और बाल मजदूरी की समाप्ति के लिए कार्यरत स्वयं सेवी संगठनों की भूमिका लगभग वही है जो सरकार की है। सरकारी मशीनरी के पास घोषणाओं और योजनाओं के भारी भारी भरकम पुलिंदे हैं तो वहीं दूसरी ओर इन कार्यों में लगे स्वयं सेवी संगठनों के लोग देश-विदेश से प्राप्त सहयोग राशि को झटक कर अपनी निजी सुख-सुविधा बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित किये हैं। यह संगठन यदा -कदा कोई सेमिनार आयोजित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। बाल श्रमिकों के उद्वार के नाम पर पलामू प्रमंडल में भी स्वयंसेवी संगठनों की कोई कमी नहीं है। इनमें से एक-दो संगठनों को छोड़ किसी ने कोई जमीनी उपलब्धि हासिल नहीं की। बल्कि अनुदान झटकने में फतह जरुर पा ली। एकीकृत बिहार में सरकार ने बाल श्रमिकों के उद्वार और उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए 114 विशेष विद्यालय या गुरुकुलम खोलने का फैसले के तहत नगर ऊंटारी अनुमंडल में भी एक गुरुकुलम की स्थापना की गयी थी। लेकिन यह विद्यालय योजना अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपेक्षित परिणाम लाने में असफल सिद्व हुई । मेदनीनगर में कचहरी की एक चाय-पान की दुकान में पाटन प्रखंड का रघु काम करता है। वह बताता है कि उसे प्रतिदिन 20 रुपये और भोजन मिलता है। स्टेशन रोड पर स्थित चाय नाश्ते की दुकानों पर पाटन के ही राजेश और जगन्नाथ काम करते है। इनकी ड्यूटी सुबह पांच बजे से शुरु होती है। और रात दस बजे समाप्त होती है। उन्हे बचा-कुचा खाना और 25-25 रुपया प्रतिदिन मिलता है। रांची रोड की एक दुकान पर काम करने वाले प्रवेश को खाना और 15 रुपये रोज मिलता है। छह मुहान के निकट मिठाई-समौसे की दुकान में चैनपूर के मंगल को साढ़े चार सै रुपये मासिक मिलता है। जिस दिन नागा करता है उस दिन का पैसा काट लिया जाता है। ग्लास प्लेट टूटने पर पैसे की कटौती भी की जाती है प्रशासनिक अधिकारी अपनी मजबूरियां बखान करते है कि पुनर्वास के लिए निधि के अभाव में कोई ठोस कदम उठाने में दिक्कत है। जोर जबरदस्ती करने पर इन बच्चों को दाल रोटी के भी लाले पड़ जायेंगे।
I an Jharkhand based Journalist cum Activist ....
