संपूर्ण झारखंड प्रदेश में अपने गौरवशाली प्राकृतिक धरोंहरों को लेकर देश-विदेश में चर्चित व विख्यात है। वैसे तो प्रकृति ने इस जिले को कई नायाब तोहफों से नवाजा और संवारा है किंतु, बेतला का राष्ट्रीय उद्यान और पठारों की रानी नेतरहाट का महत्व और आकर्षण सबसे जुदा हैं राष्ट्रीय उद्यान बेतना में जहां सैलानी शेर, हाथी, चित्तल, वाइसन समेत भांति-भांति के जंगली पशुओं के स्वच्छद विचरण का लुफ्त उठाते हैं वहीं नेतरहाट की प्राकृतिक सुषभा और सूर्योदय, सूर्यास्त के मनोहरी दृश्यों को देख भाव विह्नल हो उठते हैं और नहीं अघाते है। देशी-विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बिंदु बने इन स्थानों पर सालों भर उनका आना-जाना व जमावड़ा लगा रहता है। इन दोनों के अतिरिक्त गौरवमयी प्राकृतिक परंपरा की कड़ी में एक और नाम जुड़ा हुआ है महुआडांड स्थित बूढ़ा घाघ जल प्रपात का। यहां प्रकृति ने दिल खोलकर लुटाया है अपने बैभव का अवलोकन कर दर्शक सहसा ठिठक जाता हैं प्राकृति की इस अद्धितीय कृति को वह अपलक नेत्रों से निहारता रहता है। हजारों फीट की उंचाई से सीठुलाती सी प्रतीत होती है। दुर्गम पहाड़ो से घिरे उंचाई से गिरती जलराशि की इठलाती इतराती धाराएं चट्टानों से अठखेलियां करती उतरती हैं जो रोमांचकारी आभा विखेरती हैं। तलहटी में खड़े होकर उपर देखने की अनुभूति और फिजा का क्या कहना। कई धाराओं में विभक्त पानी कई युगों से अनवरत प्रवाहित हो रहा है जो अपने में विभक्त पानी कई युगों से अनवरत प्रवाहित हो रहा है जो अपने आप में एक अनबूझ पहेली सी लगती है। सैलानी क्षण भर के लिए मंत्रमुग्ध भावों से ओत-प्रोत होकर निहारते रहता है प्रकृति के हुस्न को। नीचे आकर यह जल बड़ी-बड़ी चट्टानों से होते हुए समतल भूभाग में प्रवेश करता है। सचमुच में प्रकृति की विराट संरचना का जीवंत रुप है यह जलप्रपात।
झारखंड राज्य के पलामू कमिश्नरी मुख्यालय से 150 कि.मी. तथा महुआडांड प्रखंड मुख्यालय से 15 कि.मी. की दूरी पर अवस्थित यह जल प्रपात प्रकृति की उत्कृष्ट कृति है जो प्राकृतिक शिल्प कला का दर्शनीय स्थल है। यह दीगर बात है कि सरकार के उपेक्षा पूर्ण रवैये का साक्षात्कार यहां होता है। 7.8 कि.मी का बना पहुच पथ सरकार की उदासीनता , कार्यशैली और बानगी की पुष्टि करता है।