झारखंड : कोल्हुआ पहाड़ तीर्थक्षेत्र एक ऐसा बन्दनीय क्षेत्र है। जहा 10वें तीर्थकर भगवान शीतलनाथ जी ने तपस्या कर केवल ज्ञान प्राप्त किया था। यह एक अत्यन्त प्राचीन एवं रमणीक क्षेत्र है। पर्वत पर उपलब्ध जैन शिलालेख, मूर्तियां, मंदिर आदि क्षेत्र की प्राचीनता एवं संस्कृति की गौरव परम्परा का मूक यशोगान कर रहे हैं। पर्वत पर स्थित घने वन, सुगन्धित जड़ी-बुटियां, निर्मल जल से पूरित विशाल सरोबर और दूर-दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाएं इनकी प्रकृतिजन्य नैसर्गिक सौदार्य की अदभूत एवं आकर्षण घटा बिखेर रही है।
यह क्षेत्र झारखण्ड प्रान्त के चतरा जिल के हंटरगंज प्रखण्ड में स्थित है। डोभी से चतरा जाने वाले मार्ग से 15 मील की दूरी पर घंघरी ग्राम है। यहां से 5 मील का कच्चा एवं सुन्दर मार्ग दन्तार को गया है। यहां दिगम्बर जैन भवन एवं चैत्यालय है। यही से थोड़ी दूर आगे चलकर पर्वत की चढ़ाई होती है। डोभी गया मार्ग से 20 मील, औरंगाबाद से 30 मील पूर्व तथा बनारस से 141 मील की दूरी पर स्थित है। जहां तक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात है अभी तक इस क्षेत्र से सम्बन्धित कोई पौराणिक या सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य प्रकाश में नहीं आया है, तथापि पर्वत पर उपलब्ध सामग्रियों के आधार से यह स्पष्ट प्रतिभाषित होता है कि जैनियों का ही यह तीर्थ क्षेत्र है। वैसे वि़द्वान डॉ. राजाराम जैन द्वारा लिखित श्रमण साहित्य में वर्णित ‘बिहार की कुछ जैन तीर्थ ‘पुस्तक’ के अन्तर्गत लेखक ने इस क्षेत्र को कोटि शिला का अपभ्रंश रूप तथा यथाकोशिला, कोटिशिलवा, कौशिलवा, कोल्हुआ कहा है। 1914 के सरकारी सर्वेक्षण में वर्तमान मंदिर को पारस नाथ दि. जैन मंदिर तथा आगे के चतूबतरे को पासनाथ चबूतरा के रूप में दर्ज किया गया है ।
इस पर्वत के सम्बंध में पहला शोधपूर्ण उल्लेख तत्कालीन क्षेत्रीय अधिकारी सर विलियम हन्टर ने किया था। इन्हीं के नाम से हंटरगंज विख्यात है। इसके पश्चात एम.ए.सेटईस, पीच.डी. ने इस पर्वत के विषय पर इण्डियन एन्टीक्वरी के मार्च 1901 के अंक में एक लेख प्रकाशित कर इस पूरे पर्वत को दिग्म्बर जैन का तीर्थ स्थान घोषित किया था। उसके अनुसार पर्वत पर स्थित मां कालेश्वरी देवी की प्रतिमा के अतिरिक्त जितनी भी मूर्तियां एवं मंदिर है वे सभी दिगम्बर जैन तीर्थकरों से सम्बन्धित है। बिहार के विख्यात पुरात्व विज्ञ पी.सी.राय चौधरी ने भी इस क्षेत्र का निरीक्षण किया है। इसका विस्तृत विवरण इनके द्वारा लिखित पुस्तक जैनईसम इन बिहार में
उपलब्ध है।
सन् 1901 ई. में पर्वत पर कई पर्वत जैन ‘मंदिर थे, उनकी जगह अब मात्र एक शिखरबन्द अत्यन्त प्राचीन जैन मंदिर उपलब्ध है। अन्य मंदिरों के भग्नावशेष यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। प्राचीन मंदिर के निकट उतर पूर्व में एक अस्पष्ट शिलालेख भी है। एक ऊंची पहाड़ी के शिखर पर आठ फीट लम्बा एवं 3 फीट चैडा चरण है जो किसी जेन तीर्थकर या मुनि का ही प्रतीत होता है। शिखर से नीचे उतने पर एक गुफा मंदिर है जिसके विशाल चट्टान के एक ओर दस दिगम्बर जैन प्रतिमाएं उकेरी हुई है। प्रतिमा श्री ऋषभनाथ जी की है। तीसरी से दसवीं प्रतिमा क्रमशः अजित नाथ जी से लेकर पुणदत्त जी तक की है। इन प्रतिमाओं के ऊपर नागरी लिपि में एक शिलालेख है जो घिस जाने के कारण पूरा पढ़ने में नहीं आता है।
उक्त गुफा-मंदिर से उतरकर कौलश्वरी मंदिर की ओर चलने पर मार्ग में एक गोलाकार शिला पर पाण्डुकशिला बनी हुई है, जिसका सिंहासन है तथा कटोरा भी बना हुआ है। इसके आगे बढ़ने पर मां कौलेश्वरी मंदिर भी दर्शन करने योग्य है। यहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन करने जाते है। मां कौलेश्वरी मंदिर से थोड़ा आगे एक विशाल गुफा में भगवान पाश्र्वनाथ की एक अत्यंत प्राचीन पद्मासन लगाये काले वर्ण की 9 कणों से मुक्त अति मनोज्ञ सर्वथा अखण्डित प्रतिमा है, जिसे जैनेत्तर भैरव कहकर पूजते हैं। पूर्व में यहां भी एक धर्मशाला था जो अभी भगनावस्था में है।
उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्टतया प्रतिभाषित होता है कि यह क्षेत्र अत्यन्त उपेक्षित रहा है। विडम्बना यह है कि जिस तीर्थ क्षेत्र पर अनेक मतावलम्बी हजारो की संख्या में प्रतिवर्ष आते रहे हैं, जहां जगत के प्राणियों के आत्म -कल्याण हेतु लोकोपकारी अंहिंसामयी धर्म का उपदेश हुआ है, जहां बौद्ध मतावलम्बी भी उतने ही श्रद्धा और विश्वास से आते रहे हैं, आज पूर्ण रूप से उपेक्षित है अथवा यह कहें कि उपेक्षा का दंश क्षेल रहा है।
मंदिरों के शहर की सड़कों का बुरा हाल
चौकिये नहीं! यह कोई और जगह नहीं मंदिरों के नगर वाराणसी के बारे में ही बातें हो रही है। यहां के गली-कूचे जहां देखिये कोई न कोई मंदिर दायें-बांये अवश्य दिख जायेगा। पूरे साल भर श्रद्धालु यहां भगवान का दर्शन करने आते रहते है। इस शहर की सड़कों की स्थिति अजीब है, जहां थोड़ी बारिस हुई सड़कों को जुकाम हो जाता है और नजारा बदल जाता है। जाड़ा, गर्मी, बरसात कोई भी मौसम हो बारिश के प्रति यह शहर काफी संवेदनशील है और तुरंत नजला-जुकाम की गिरफ्त में आ जाता है।
चाहे वह भगवान विश्वानाथ का स्थल गोदौलिया हो, नगर निगम के आस-पास की जगह हो, स्टेशन से डी.एल.डब्ल्यू.या बी.एच.यू. जाने की सड़क हो, रथयात्रा चैराहा हो या अन्य गली-मोहल्लों की सड़कें हों, सब जगह कीचड़ पानी ही नजर आता है और उसे पार करने के लिए लोगों को अपने जूते-चप्पलों का स्थान बदलकर उन्हें हाथ में पहनना पड़ता है।
गली-मोहल्लों की पतली-पतली गलियां, जिसमें एक बार में कोई एक ही गाड़ी निकल सकती है, बारिश में अगर पानी से भर जाए तो क्या कहने ? बरसात में तो इस शहर की स्थिति और नरकीय हो जाती है । कहीं कोई ऐसी सड़क नहीं मिलेगी, जिस पर सड़ा पानी कीचड़ न हो । सड़कों पर इस तरह की गंदगी के बीच संभ्रांत परिवारों के साथ-साथ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले भी अपने-अपने घरों का कूड़ा-करकट सभी कुछ सड़कों के ही हवाले कर देते हैं। कुल मिलाकर गंदगी का अंबार इस नगर की सड़कों पर ही रहता है। प्रदूषण नियंत्रण की तमाम घोषणाएं की जाती हैं, राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर। क्या ये घोषणाएं महज घोषणाएं ही नहीं है। मच्छरों, कीड़े-मकोड़ों का प्रकोप सिर्फ नगरवासी ही नहीं झेलते, अपितु इस ऐतिहासिक नगर को देखने आने वाले सभी देशी-विदेशी सहते है और यहां के डाक्टरों की चांदी कटती रहती है।
यहां की आबादी लगभग 26 लाख से अधिक है। अब नगर महापलिका नहीं बल्कि नगर निगम क्रियाशील है, लेकिन विकास कार्यो को देखकर ऐसा लगता है, यह संस्था बीमार है। अगर ठीक से सक्रिय होती तो सड़कों पर सफाई कर्मचारी अवश्य नजर आते और कुछ गंदगी हटाने का कार्य करते। वैसे इस तरह की समस्या यहां की ही नहीं प्रदेश की अन्य नगरपालिका, महापलिका और नगर निगमों की भी है।
कर्मचारी कभी-कभी खानापूर्ति के लिए निकलते है और थोड़ा बहुत काम करते हुए अपनी संस्था के जिंदा होने का सबूत भी देते है, लेकिन गंदगी बरकरार है तो बरकरार ही है। राजनेताओं की स्थिति तो राज भोगने जैसी ही है। एम.पी, एम.एल.ए. सभासद, मेयर सभी अपने में मस्त हैं। किसी का ध्यान इस जानलेवा समस्या की तरफ नहीं जाता। इसमें ऐसी बात नहीं है कि इनके घर के आस-पास गंदगी नहीं है। कुछ घर तो बरसात शुरू होने के साथ ही चारों ओर से पानी में घिर जाते है।
क्या वे अपनी इस समस्या का समाधान नहीं चाहते है ?आवाज उठाकर अवश्य इस तरह कुछ ठोस प्रगति हो सकती है, लेकिन किसको पचड़े में पड़ने की पड़ी है। सत्ता सुख भोगने में ही जो अपनी काबिलियत समझते हैं, उन्हें इस काम से कुछ लेना-देना वैसे भी नहीं है। जिन्हें यह नरक भोगना पड़ रहा है, वे भी दूसरों की पहल के इंतजार में बैठे हैं।
नगरवासियों का व्यक्तिगत प्रयास जहां नहीं के बराबर है, वहीं रोज कठिनाई से आने-जाने के आदी हो चुके है। सड़क की जमीन का अतिक्रमण करते-करते लोग पहले तो सड़कों को संकरा करते है और फिर गंदगी डालकर सड़क की गंदगी से पाट देते है। इस परिपाटी पर रोक लगाने की आवश्यकता है।
सरकार द्वारा विकास के नाम पर बेशुमार धन खर्च किया जाता है। हर वर्ष सड़कों की मरम्मत होती है, जल निकासी की व्यवस्था की जाती है, लेकिन सिर्फ कागजों में। कहीं-कहीं पानी निकालने के लिए पंप भी लगे है, लेकिन अपर्याप्त, जनता की सेवा के लिए तैनात कर्मचारी और अधिकारी खूब आराम तलब हो गये है और सरकारी खजाने का मुंह अपने व्यक्तिगत खर्चो के लिए ही खोलते है।