पलामू: डालटनगंज विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत मेदिनीनगर शहर के समीप कोयल नदी के पश्चिमी तट पर ‘चेरो’ राजा गोपाल राय का शाहपुर किला अपने अतीत पर आंसू बिखेर रहा है। मेदिनीनगर से बिल्कुल ही सटे हुआ प्रखंड चैनपुर में ऐतिहासिक किला शाहपुर अवस्थित है। चैनपुरवासी इस किले को पूरी तरह से उपेक्षित कर चुके हैं। शाहपुर किला का अवलोकन करने के बाद मेरे जेहन में एक सवाल आया कि क्या यहां के जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों, राजनीतिज्ञों व गैर सरकारी संगठनों की नजर में इस किले का कोई महत्व नहीं है। यदि उनके लिए यह महत्वपूर्ण होता, तो अब तक यह किला कदापि उपेक्षित नहीं होता।
आश्चर्य है कि इंदरसिंह नामधारी- जो काफी लंबे समय से विधायक रहे व एकीकृत बिहार व 9 साल पूर्व बने नए झारखंड में भी उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया- यहां से जुड़े रहे हैं, उसके बावजूद यह किला आखिर आज तक क्यों उपेक्षित रहा, यह एक रहस्य ही बना हुआ है। दूसरी ओर यहां के सक्रिय राजनीतिज्ञों, गैर सरकारी संगठनों ने भी शाहपुर किला के जीर्णोद्वार के लिए कोई सक्रियता नहीं दिखाई। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि शहर व आसपास के बच्चे अपने अभिभावकों से इस किले को देखने की इच्छा प्रकट करते हैं। उस परिस्थिति में अभिभावक चाह कर भी उन्हें किला नहीं दिखा पाते। यह यहां के बच्चों के साथ अन्याय है। पलामू के सच्चे पुत्र व स्वतंत्रता सेनानी नीलांबर व पीतांबर की अमर कहानियों को भुलाया नहीं जा सकता है। पलामू के मेदिनीनगर के लोगों के मन मस्तिष्क में वे आज भी विराजमान हैं। झारखंड राज्य के गठन के बाद अब समय आ चुका है कि पलामू की धरोहर को संजोया व संवारा जाये। इसमें यहां के जनप्रतिनिधि, समाजसेवियों व बुद्धिजीवियों को एक साथ मिलकर यह महत्वपूर्ण कार्य करना चाहिए। लेकिन, दुखद स्थिति यह है कि उक्त तीनों का मिलन का काफी कठिन हो गया है। पता नहीं यहां किसकी नजर लग गयी है!
जहां तक शाहपुर किला के बारे में विदित है, तो इतिहास के पन्ने में दर्ज रिकार्ड के अनुसार शाहपुर किला का दुर्ग ईंट का बना हुआ है। इसके बुर्ज पर बंदूक व तोप के गोले छोड़ने के लिए छिद्र बने हुए हैं। किले की निचली सतह पर प्रमुख कर्मचारी रहते थे। उसके तृतीय मंजिल पर सभा कक्ष था। सभा कक्ष के द्वार पर सुंदर नक्काशी की हुई थी। भीतर की दीवारों पर बेल-बुटों के नक्काशी के निशान मिले हैं। किले की दुसरी मंजिल पर शील महल यानी रानी निवास था। बुर्ज पर दो कोठरियां बनी हुई थीं। इस किले का निर्माण 1772 में हुआ था। ठाकुर जयनाथ सिंह उस युग के प्रभावकारी पुरूष थे। वे राजा के दीवान थे। पलामू किले पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के बाद भी ठाकुर जयनाथ सिंह उनसे लोहा लेते रहे। 24 अप्रैल 1772 में उदयपुरा घाट पर कंपनी के सेनानायक थॉमस स्कॉट और ठाकुर के बीच भयानक लड़ाई हुई। इस लड़ाई में सार्जेंट पिल्विन मारा गया और लेफ्टिनेंट स्कॉट के पैर में गोली लगी। राजा गोपाल राय व उनके भाई कर्णपाल राय अपने ही दुर्ग शाहपुर में कैद कर लिये गये थे। चतरा न्यायालय ने गोपाल राय को जेल की सजा सुनाई और 1784 में उनकी मृत्यु पटना में हो गयी।
शाहपुर किले के विषय में एक बात और चर्चित है कि 1857 के विद्रोह काल में राजा रणबहादुर राय की विधवा रानी ने शाहपुर दुर्ग में ‘चेरो’ जागीरदारों की एक सभा बुलाई थी। उस सभा में चेरो राजा भवानी बख्श राय भी उपस्थित थे। जब अंग्रेजों के कान में इसकी भनक पड़ी, तो वे बेचैन हो उठे। तब कनीय सहायक समाहर्ता कैंपवेल ने बाबू को अविलंब शाहपुर छोड़ देने का फरमान भेजा था। तब भवानी बख्श राय ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से शाहपुर के मोरचा को ही समाप्त करना उचित समझा था। पलामू जिला मुख्यालय से सटे चैनपुर प्रखंड का प्राचीन पलामू में काफी नाम है। चैनपुर, लादीगढ़ के नाम से मशहूर है। इस गढ़ के बारे में कहा जाता है कि राय बहादुर अमर दयाल सिंह का चैनपुर की सीमा पर एक गढ़ है। उनके बाद कुंअर अंबिका प्रसाद सिंह इस गढ़ के मालिक हुए। उनके पूर्वज गोरखपुर जिले के मझौली राज के थे। कुंअर अंबिका प्रसाद सिंह के मृत्युपरांत इस गढ़ की रौनक ही समाप्त हो गयी।
I an Jharkhand based Journalist cum Activist ....
