नई दिल्ली : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कल चार दिवसीय अमेरिका यात्रा पर जाएंगे। शिखर सम्मेलन में वित्तीय बाजारों के नियंत्रक नियमों को मजबूत करने और वैश्विक आर्थिक हालात के संकट से उबरने के तरीकों पर चर्चा होगी। मनमोहन सिंह की अगुवाई वाले शिष्टमंडल में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन समेत अन्य लोग शामिल हैं।
प्रधानमंत्री पिट्सबर्ग में राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा 24-25 सितंबर को आयोजित सम्मेलन में भाग लेंगे। भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ जी-8 देशों के प्रमुख अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों के बीच इसकी प्रक्रिया तेज करने के बारे में विचार-विमर्श करेंगे। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इन देशों की हिस्सेदारी 90 फीसदी और वैश्विक कारोबार में 80 फीसदी हिस्सेदारी है।
इतना ही नहीं दुनिया की दो तिहाई आबादी यहां रहती है। पिछले साल सितंबर में शुरू हुए वित्तीय संकट के बाद से इस संबंध में यह तीसरा शिखर सम्मेलन है। सम्मेलन में पूर्व बैठकों-वाशिंगटन (2008) और लंदन (अप्रैल 2009) - में तय कदमों के क्रियान्वयन की समीक्षा की जाएगी।
हालांकि सम्मेलन जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर बातचीत का मंच नहीं है लेकिन यह मुद्दा भी उभर कर सामने आनेवाला है, क्योंकि सभी देश अपने आपको संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित कोपनहेगन सम्मेलन के लिए तैयार कर रहे हैं। भारत ने कार्बन उत्सर्जन के लिए विकसित देशों पर और अधिक जिम्मेदारी तथा गरीबों और उभरते देशों के लिए प्रौद्योगिकी अन्वेषण के लिए धन देने का समर्थन किया है।
पिट्सबर्ग सम्मेलन की बुनियाद इस महीने लंदन में हुए जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों के सम्मेलन में तैयार कर ली गई थी जिसमें फैसला किया गया कि वे अपेक्षाकृत, स्थाई और सतत विकास के लिए काम करेंगे। उन्हें वैश्विक कारोबार का पुनर्संतुलन, घरेलू बाधाओं को दूर करना और वैश्विक बाजारों का बेहतर परिचालन करना होगा।
उम्मीद है कि भारत इस मौके पर आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं में सुधार के जरिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचो में बदालव की पुरजोर वकालत करेगा, ताकि गरीब और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज सुनी जा सके। प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं में सुधार के जरिए अंतरराष्ट्रीय गवर्नेंस में सुधार की भी मांग कर सकते हैं, ताकि भारत जैसे देश को इस शक्तिशाली समिति में स्थाई सदस्यता हासिल हो सके।



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