झारखंड : झारखंड में अकूत खनिज संपदा, प्रचूर वन संपदा एवं अनेक कुटीर उद्योगों की संभावनाओं से परिपूर्ण है। बावजूद इसके यहां से हजारों मजदूर हर मौसम में झारखंड से बाहर रोजी -रोटी की तलाश में जाते रहते हैं।
कृषि कार्य के प्रारभ्म होते ही चाहे वह धाना की बोवाई का समय हो या धान -गेहूं की फसल काटने का वक्त हो मजदूरों का दल परिवार सहित पंजा, सूरत, दिल्ली एवं गया के इलाकों में पहुंच जाते हैं। बसों एवं रेल गाड़ियों में उनका काफिला देखा जा सकता है। गत कुछ वर्षो से पलायन करने वाले मजदूरों की सेख्या अचानक बढ़ गयी है। इसके कई कारण हैं।
प्रथमतः तो खनिज उद्योगों का चालू नहीं होना या बंद हो जाना, जिससे मजदूरों के समक्ष काम के अभाव में भुखमरी की स्थिति पैदा हो गयी है। दूसरा कारण है उग्रवाद प्रभावित जिला होने से जंगल भी अब आम लोगों के लिए नहीं रहा पोड़ी तोडने से लेकर जलावन की लकड़ी बेचकर पेट पोसने का सहारा भी लगभग समाप्त हो गया तीसरा कराण यह भी है कि उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र होने के कारण गांव के बडे़ किसान भय से अब गांव छोड़कर शहर में आ गये हैं। उन्होने गांव यहीं अपना व्यवसाय का विस्तार कर अपनी स्थितिमें सुधारा कर लिया मगर उनके यहां सालो भर काम करके जीविका चलाने वाले मजदूरों के सामने रोटी के लाले पड़ गये।
वर्षा के पानी के भरोसे खेती भी छोटे और मंझोले किसानों के साथ जुए का खेल है। छह माह के बाद वैसे किसान भी मजदूरों की श्रेणी में आ जाते है। उपर्युक्त कारणों के अलावा भी झारखंड के अधिसंख्य इलाके मे अशिक्षा गरबी और कुपोषण से मजदूरों की तादाद वैसी काफी थी। देश के जिन -जिन प्रदेशों मे मजदूरों का पलायन होता है।
वहां भी उनका भरपूर शोषण होता है। यह सही है कि उन्हे भरपेट भोजन और रुपये भी मिलते हैं मगर उसक एवज में उनका शारीरिक आर्थिक और मानसिक शोषण भी होता है, जिन्हें बर्दाश्त करना उनकी मजबूरी होती है। वे जब अपने घर लौटते है तो अपने साथ कई बुरी आदतें, नशीले पदार्थो के सेवन के शिकार, यहां तक एड्स जैसी जघन्य बीमारियों के संवाहक बनकर लौटते हैं। जिससे उनका जीवन तिल -तिल कर जलता है और पतन के कगार पर पहुंच जाता है। शहर में हजारों मजदूरों का प्रतिदिन आना काम की तालाश करना और खाली हाथ घर लौटना किसी भी सद्धदय व्यक्ति के हृदय दवित करने के लिए काफी है।
मजदूरों का पलायन का दर्द झारखंड के सीने पर जख्म है। जब तक इस गंभीर समस्या का निदान व्यवस्था द्वारा सुनिश्चित नहीं होता यह और भी विकराल हो ती जायेगी। उग्रवाद को भी फलने फुलने की इससे पृष्ठभूमि मिल जा रही हे। गांव-गांव मे गृह उद्योगों के लिए ऋण मुहैया कराकर चाहे वह लकड़, लोहा, चमड़ा, पत्थर आदि किसी तरह का भी हो ही मजदूरो का पलायन रुक सकता है।