सरकार आईआईटी में प्रवेश के लिए 80 फीसदी अंक लाने की बाध्यता लागू करने जा रही है। इससे पहले यह अंक सीमा 60 फीसदी थी। मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से उठाए जाने वाले इस कदम को लागू होने से पहले ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। इस नए नियम को लागू करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि आईआईटी में प्रवेश की तैयारियों की वजह से छात्र 12वीं की परीक्षा को कम अहमियत देते हैं। हालांकि यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन इसके साथ ही तस्वीर के दूसरे पहलू को भी देखा जाना जरूरी है। यह बात कई बार कही जाती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली रोजगार सजृन करने में सक्षम होनी चाहिए। सिर्फ किताबी ज्ञान से न तो आज के दौर में रोजगार मिलता है और न ही यह डिग्री लेने भर से नौकरी, तो ऐसे में अगर विद्यार्थी आईआईटी को अपना लक्ष्य बनाकर तैयारियां करते हैं, तो इसमें आखिर गलत क्या है।
इसके साथ ही अंक सीमा में इजाफा करने से कमजोर और पिछड़े वर्ग के छात्रों की भागीदारी इस संस्थामनों में घटेगी। आईआईटी करने के बाद रोजगार की व्याईपक संभावनाएं खुल जाती हैं, लेकिन यह फैसला उन हजारों छात्रों के सपनों पर पानी फेर सकता है, जो 12वीं के साथ-साथ आईआईटी की तैयारियां करते हैं।
सरकार का तर्क है कि आईआईटी की तैयारी कराने के लिए मशरूमों की तरह कोचिंग सेंटर खुलते चले जा रहे हैं, तो सवाल यह है कि अगर सरकारी अमला उन सेंटरों पर रोक लगाम में नाकाम है, तो भला इसका खामियाजा विद्यार्थी क्यों भुगतें। जरूरत इस सेंटरों पर लगाम लगाने की है। नियमों को कड़ा बनाकर उन्हें सख्ती से लागू करने की इच्छा शक्ति की जरूरत है। ना कि यह सब बातें कर विद्यार्थियों पर दबाव बनाने की।
सबसे जरूरी बात, इन्हींर मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्ब्ल ने दसवीं के बोर्ड में ग्रेडिंग सिस्टमम लागू किया। तर्क दिया गया कि इससे बच्चों में बोर्ड का हौव्वा समाप्त होगा और वे ज्यादा अच्छी तरह से मेहनत करेंगे। बच्चों और उनके माता-पिता पर मानिसक दबाव कम होने की बात भी यहां कही गई। इस आधार पर देखा जाए, तो इसे फैसले से विरोधाभास झलकता है। जरूरत और ज्यातदा आईआईटी खोलने की है, ताकि ज्यादा से ज्यादा नौजवान अपना और अपने देश का भविष्य संवार सकें, न कि इसकी कि मौजूदा संस्थानों में भी आम विद्यार्थी की पहुंच मुश्किल बनाने की।
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