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‘बोलो राम‘ मेरे लिए लकी साबित होगी : ऋषि भूटानी
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प्रकाशन तरीख : 19-Dec-2009 18:36:17 द्वारा: कुमार अनुज Font Size:

बोलो राम‘ के जरिए आपकी बॉलीवुड में एंट्री हो रही है ? कैसा महसूस हो रहा है आपको ?

सच पूछिए तो मुझे बेहद खुशी हो रही है कि ‘बोलो राम‘ से मैं फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख रहा हूं। यकीनन यह फिल्म मेरे लिए बेहद लकी साबित होगी। लेकिन हां, एक बात मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि मुझे ज़रा भी डर नहीं लग रहा है। मेरा मानना है कि जब आपने मेहनत की है, ऐसे में फल तो आपको मिलेगा ही। मैंने भी इस फिल्म के लिए बखूबी मेहनत की है। इसलिए दावा कर सकता हूं कि दर्शकों को मेरा काम ज़रुर पसंद आएगा। साथ ही इस फिल्म को लेकर मैं बेहद उत्साहित भी हूं।

‘बोलो राम‘ के बारे में संक्षिप्त में बताइए।

‘बोलो राम‘ की कहानी एक लड़के राम कौशिक जोकि मै निभा रहा हूं के इर्द-गिर्द घूमती है। यह रोमांच से भरपूर एक रहस्यात्मक मर्डर मिस्ट्री है। राम पर उसकी मां अर्चना (पद्मिनी कोल्हापुरी) के मर्डर का चार्ज लगा होता है। वहीं दूसरी ओर, राम अपनी मां की मौत से सदमे में आकर साइकोटिक डिस्आर्डर का शिकार हो जाता है। वह न सिर्फ शांत हो जाता है बल्कि किसी से बात नहीं करता और किसी भी घटना के प्रति प्रतिक्रिया भी नहीं देता है। इस अनसुलझी पहेली को सुलझाने के लिए इन्वेस्टीगेटिंग ऑफिसर इंद्रजीत सिंह राठी (ओमपुरी) मामले की जांच-पड़ताल करते है और राम की मानसिक स्थिति एवं चुप्पी का कारण जानने को लिए उसे एक सायकायट्रिस्ट डा. एन. एस. नेगी (नसीरुद्दीन शाह) के पास ले जाते है। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह अर्चना व राम से संबंधित उन सभी लोगों से कड़ी पूछताछ करते है। वह हर उस पहलु तक जाते है कि क्या वाकई राम ने अपनी मां का खून किया है। लेकिन कहानी में नया मोड़ तब आता है, जब राठी के द्वारा राम के पड़ोसी सब-इंस्पेक्टर साजिद खान (गोविंद नामदेव), उसकी बेटी जूही (दिशा पांडेय) व उसके बेटे समीर (कृष्ण खतरा) को पूछताछ के लिए बुलाया जाता है। क्या राम की चुप्पी इस पहेली को सुलझाएगी ? यही है बोलो राम। 

इस फिल्म में आपने किरदार के बारे में बताइये ?

इस फिल्म में मैंने राम कौशिक का किरदार निभाया है जिसकी मां का रहस्यमय तरीके से मर्डर हो जाता है और मां की मौत से सदमे में आकर वह साइकोटिक डिस्आर्डर का शिकार हो जाता है। इस फिल्म में मेरा किरदार संजीदा होने के साथ ही काफी दमदार भी है जिसे देखने के बाद लोगों की ज़ेहन में मेरा नाम काफी समय तक रहने वाला है।

पहली ही फिल्म में आपको नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी व पद्मिनी कोल्हापुरी के साथ काम करने का मौका मिला है। कैसा रहा उनके साथ काम करने का अनुभव ?

मैं बेहद लकी हूं कि मुझे अपनी पहली ही फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी व पद्मिनी कोल्हापुरी जैसी हस्तियों के साथ काम करने का मौका मिला। मुझे उन सभी के साथ काम करके बहुत मज़ा आया। और सिर्फ इतना ही नहीं, इस दरम्‍यान काफी कुछ सीखने को भी मिला। देखा जाए तो मेरे लिए बॉलीवुड के इतने प्रतिभाशाली अभिनेताओं के साथ काम करना किसी चैलेंज से कम नहीं था। शूटिंग के पहले दिन तो मैं काफी नर्वस था। लेकिन फिर कैमरे के सामने नसीर सर, ओमपुरी सर व पद्मिनी मैंम ने मुझे काफी कम्फर्टेबल महसूस कराया। मेरे लिए यह किसी सपने से कम नहीं है कि अपनी पहली ही फिल्म में मैंने इतनी बड़ी हस्तियों के साथ काम किया है। 

आपने काफी थियेटर भी कर रखे है। बतौर अभिनेता थियेटर करने का कितना फायदा आपको मिला ?

यकीनन, थियेटर का फायदा एक अभिनेता को मिलता है क्योंकि थियेटर अभिनय की परिपक्वता को समझाता है। रंगमंच न सिर्फ अभिनय के मूल तत्व की बारिकियों को सीखाता है बल्कि एक आम इंसान को अभिनय की दुनिया से भलीभांति रुबरु भी कराता  है। ऐसे में मैं सिर्फ यही कहूंगा कि थियेटर किसी भी अभिनेता की रीढ़ की हड्डी समान होती है। 

आप किस तरह के रोल करने की चाह रखते है ?

मैं किसी भी एक किरदार में बंध कर नहीं रहना चाहता हूं। या यूं कह लीजिए कि मैं सभी तरह के किरदार को निभाने की चाह रखता हूं। फिर चाहे वह ‘बोलो राम‘ में गुमसुम किरदार का हो या किसी और फिल्म में रोमांटिक हीरो का। मैं उम्मीद करता हूं आगे जितने भी किरदार निभाउं, वे सभी एक-दूसरे से अलग हो।

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