भारतीय शास्त्रों पर जो भी नृत्य आधारित हैं, वे सभी शास्त्रीय नृत्य कहलाते हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि इन नृत्यों को कलात्मक रूप में शंकर-पार्वती ने प्रस्तुत किया और भरत मुनि ने उन्हें अपने कालजयी ग्रंथ ‘नाट्य शास्त्र’ में वर्णित किया। नृत्य वास्तव में ईश्वर के दिव्य प्रेम, अध्यात्म और प्रकृति का अनुपम रुप में प्रकट करते हैं, यही कारण है कि इनका सबसे अधिक विकास भी मंदिरों में हुआ है। भारतीय नृत्य परंपरा को एक से बढ़कर साधिकाओं और साधकों ने समृद्ध किया है। भारतीय नृत्य की परंपरा को आगे बढ़ाने में कई युवा कलाकार प्राणपण से से लगे हुए हैं। उन्हीं में से एक नाम है रेनु राय, जो शास्त्रीय नृत्य के साथ सभी तरह के नृत्य में पारंगत होने के अलावा कविता-गजल लेखन, पेटिंग, और गायन में भी कुशल हैं। पिछले दिनों मेरीखबर के नागरिक पत्रकार रहीम खान ने भारतीय नृत्य शैलियों एवं अन्य मुद्दों पर रेणु से विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:
आपको डांस का शौक कब से है?
मुझे बचपन से ही कला के क्षेत्र में रूचि थी, जिसके कारण मैं कुछ नया करने के लिये हमेशा प्रयासरत रहा करती थी। नृत्य माधुर्यपूर्ण कला है, ये साधना और पूजा है। ये मुझे विरासत में नहीं मिली। नृत्य करने की आंतरिक प्रेरणा ने ही मुझे इस कला या कहें कि विद्या को अपनाने के लिय प्रेरित किया। इसमें मेरे कोई गुरू नहीं है।
आप कौन-कौन से नृत्य कर लेती हैं?
प्रायः प्रायः शास्त्रीय नृत्य तो सभी कर लेती हूं। लोक नृत्य (फोक डांस) के साथ पश्चिमी नृत्य में भी रूचि है, परन्तु मुझे इस बात को कहने में गर्व है कि एक भारतीय कलाकार तो शास्त्रीय नृत्य के साथ पश्चिम नृत्य आसानी से कर लेता है, परन्तु पश्चिमी कलाकार शास्त्रीय नृत्य नहीं कर पाते। मेरी दृष्टि में वेस्टर्न डांस से भारतीय नृत्य सर्वश्रेष्ठ है।
शास्त्रीय नृत्य क्या है?
भारतीय शास्त्रों पर आधारित नृत्य ही शास्त्रीय नृत्य कहलाते हैं। इसके विभिन्न रूप हैं। कुछ उदाहरण हैं:
भरतनाट्यम्- ये दक्षिण भारत की प्रमुख नृत्य शैली है। इसमें कविता, संगीत, नृत्य और नाट्य का समावेश होता है।
कथक नृत्य- ये उत्तर भारतीय नृत्य है, जिसमें कथाओं का वर्णन होता है। यह पद संचालन एवं आकर्षक मुद्राओं द्वारा कथाओं का सुन्दर नृत्य माना जाता है। इसका उद्देश्य वेदों व उपनिषदों में वर्णित धर्म व अध्यात्म का प्रचार करना है।
मणिपुरी नृत्य- ये उत्तर-पूर्व भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है। इसे ‘लाईहरीवा या रास नृत्य’ भी कहा जाता है, जो मणिपुर राज्य में बहुत प्रचलित है।
कथकली नृत्य- ये कर्नाटक एवं मालाबार क्षेत्रों की प्राचीन नृत्य शैली है। ये पुरूष प्रधान नृत्य है, जिसमें नृत्य संगीत तथा अभिनय की संयुक्त कला प्रस्तुत की जाती है।
मोहिनीअट्टम- ये केरल का प्रमुख नृत्य है। यह मन को मोह लेने वाला नृत्य है। इसके बारे में कहा जाता है कि इस नृत्य के माध्यम से विष्णु जी ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं की राक्षसों से रक्षा की थी। वैसे दूरदर्शन पर लोगों को भारतीय शास्त्रीय संगीत से रूबरू कराने के लिये कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं, जिसमें शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी हस्तियों द्वारा कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। इसके माध्यम से भी नये कलाकारों को बहुत कुछ सीखने मिला है।
क्या आप सामाजिक संगठनों से भी जुड़ी हैं?
मैं दिल्ली में एक कंपनी में सर्विस करने के साथ एक गैर सरकारी संग्ठन (एनजीओ) से जुड़ी हूं। साथ ही, विकलांग बच्चों के साथ गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिये व्यक्तिगत रूप से मदद करती हूं।
संगीत में गिरावट के क्या कारण है?
समय के परिवर्तन के साथ श्रोताओं की पसंद भी बदलती रहती है। आज की युवा पीढ़ी रीमिक्स, पॉप संगीत में लगाव रखती है, जो पश्चिम संगीत से प्रभावित हैं। परन्तु, भारतीय संगीत कर्णप्रिय है, जो सीधे आपके दिल की गहराईयों को छुता है। अतीत में जरूर कुछ गीत ऐसे आये, जिसके द्विअर्थी भावों ने संगीत की छवि को प्रभावित किया। व्यवसायीकरण की आंधी से संगीत का क्षेत्र भी प्रभावित है। परन्तु, संगीत की महिमा अपरम्पार है। संगीत की स्वर लहरियां हृदय के तारों को झंकृत कर देती हैं। संगीत का मानव मन पर गहरा असर पड़ता है। ये दर्द और दवा भी है।
भारतीय नारी की स्थिति कैसी है?
मेरी दृष्टि में आज की भारतीय नारी प्रगतिशील है और वो जमीन से लेकर आसमान तक पुरूष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पर्याप्त शिक्षा के अभाव में अवश्य अंधविश्वास, रूढ़िवादी प्रथाओं का शिकार हो रही है। इसलिए, ग्रामीण क्षेत्रों में महिला शिक्षा की स्थिति में सुधार करना अति आवश्यक है। वहीं कन्या भ्रूण हत्या जैसे घृणित कार्य करने वालों को बड़ी सजा दी जानी चाहिए।



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